• Vijay Manohar Tiwari

कवि में चराचर जगत झिलमिलाता हुआ दिखाई देगा

Updated: Feb 16


विजय मनोहर तिवारी writes on his FaceBook Wall .


जो परमानंद किसी इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट को महीनों की मशक्कत के बाद लिखी किसी खोजपरक बमपलाटू खबर के छपने पर मिलता है या जंतर-मंतर पर अड़ियल आंदोलन के बाद सरकार के गिरने से आंदोलनजीवियों को प्राप्त होता है, बिल्कुल उतने ही कैरेट का परमानंद कवि की मनोहर कहानियों के लेखक ने दो सौ शब्दों के एक ही फ्रेम में लूट लिया है


शुरू में लगता है चकरी चली। फिर आसपास ही अनार के रंग और रोशनी के बिखरने का अहसास और फिर फुलझड़ी का नजारा। फौरन ही ज्ञात हो जाता है कि वह तो सुतली बम था! कहानी बड़े हौले से शुरू होती है। ओपी नय्यर की धुन वाले ‘जरा हौले-हौले’ जैसा हौले! आप इस हौले के हवाले ऐसे हो जाते हैं, जैसे हिंडोले पर हों। लेकिन जल्दी ही कवि इस सुखद आनंद से खचोड़कर एक ऐसे मोड़ पर ला पटकता है कि तबियत सुन्न हो जाए। बिल्कुल सुतली बम!


हमारे समय के जाने-माने व्यंग्यकार-पत्रकार यशवंत व्यास की ताजा किताब है ही ऐसी। इसमें ‘कवि की मनोहर कहानियां’ हैं। यूं भी कह सकते हैं कि कहानियां कहने के लिए महर्षि व्यासजी ने एक अदद कवि को निमित्त मात्र बना दिया है। मनोहर कवि मिलते ही ‘खटाक फिक्शन सीरीज’ की प्रस्तुति कल्याणजी-आनंदजी या आरडी बर्मन के जमाने के धूमधड़ाके से शुरू फिल्म हो जाती है। मतलब पूरे गाजे-बाजे से कहानी का मंगलाचरण।


किताब की शुरुआत में कवि के मंगलाचरण में सर्वप्रथम कवि को ही यह अनुभूति कराई गई है कि पहले चकरी चलने जैसा लगे, फिर सतरंगी अनार और फुलझड़ी और अगले पन्ने पर जाने के पहले ही सुतली बम! इन कहानियों का मनोहारी कवि बहुआयामी है। उसके सारे आयाम प्रथम पृष्ठ में ही खोल दिए गए हैं। जैसे-‘कवि आत्मा है, मनुष्य शरीर है। कवि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बैठा सोच रहा है, वह आदमी बन गया तो कविता कौन करेगा? कवि आरटीआई लगाता है और क्रांति का भुट्‌टा खाता है।’ ये तीन वाक्य चकरी, अनार, फुलझड़ी और सुतली बम के ऐसे प्रतीक हैं, जो मिसाइल की तरह सबसे पहले कवि महोदय पर ही टेस्ट किए गए हैं। परीक्षण सफल रहा है।


कवि के साथ मनोहर कहानियों का पहला ही फ्रेम कफन में आया। प्रेमचंद की कहानी के माधव और घीसू मिल गए और कलाली में जाकर किस्सा खत्म हो गया। इस बीच क्या संवाद हुआ, सस्पेंस ही चला जाएगा अगर कुछ भी बताया। कफन को कलाली में छोड़कर कवि न्यूयार्क सरक गया। सफर की शुरुआत चकरी से है। देख लीजिए-‘उसने अमेरिका के खिलाफ एक लाख पचास हजार शब्द लिखे थे। एक लाख पचास हजार एकवां शब्द लिखने को ही था कि फैलोशिप आ गिरी!’


कहीं-कहीं कवि चकरी के चक्कर में पहली ही पंक्ति में सुतली बम की ध्वनि सुन रहा है। जैसे-‘कवि के पिता स्वर्गवासी हुए। नौ साै लाइक्स मिले!’ कवि रोज कांग्रेस से नाश्ता भरता है और कम्युनिस्ट पार्टी के पिछवाड़े नाशता करता है। न किसी को शुबहा, न तकलीफ!


कुलमिलाकर 49 फ्रेम हैं। हर फ्रेम के लीड रोल कवि का है। कवि इनमें व्यासजी रचित सृष्टि को कोने-कोेने में जाकर नाप रहा है। जो थोड़ी-बहुत कसर यहां रह गई थी, वह सबसे आखिर में ‘फटी डायरी के दो साबुत पन्ने’ में निकाल दी गई है। बीच में कहीं कोरोना काल प्रकट होते ही-‘कवि क्वारंटाइन में है। कविताएं मास्क लगाए बिना बाहर घूम रही हैं!’


‘कवि नेताओं का नेता हुआ। वह पार्टी के नारे लिखने बैठा। बाहर कई कवि बैठे थे। किसी को खुद के लिए कुछ नहीं चाहिए था। सब दूसरे के लिए मांग रहे थे। एक को बेटे का ट्रांसफर कराना था। एक को बहू की पोस्टिंग करवानी थी। एक को क्रांति पर काम के लिए फेलोशिप चाहिए थी। एक को यूनिवर्सिटी की इज्जत बचाने के लिए वाइस चांसलर बनना था।’


इस फ्रेम को दुबारा पढ़िए तो कवि में चराचर जगत झिलमिलाता हुआ दिखाई देगा, जहां हर श्रमजीवी, हर बुद्धिजीवी और हर आंदोलनजीवी किसी फिराक में बैठा है। मौके की घात लगाए। तब कवि ने पहला नारा पूरा किया। नारा चल गया। पार्टी डूब गई। अब मुश्किल यह है कि वह क्रांति कहता है, लोग दंगा समझ लेते हैं। वह करुणा का रेट कार्ड बनाता है, लोग किसी एनजीओ के फ्रॉड का ताजा आंकड़ा समझ लेते हैं। वह सन अड़तालीस कहता है, लोग सन चौरासी समझ लेते हैं!


वो कहानियां ही क्या, जिनका सार न हो। यहां हर कहानी का सार है, जो जरूरी नहीं कि आखिर में आए। कोई कहानी सार से शुरू हो सकती है तो कहीं सार बीच में पके हुए सेव की तरह टपक सकता है। कवि के सम्मान में आपको न्यूटन की तरह सतर्क होना होगा। जैसे-‘उत्तम खानदानी बिल्लियां वो हैं तो कबूतरों की सभा में शाकाहार पर भाषण देने के लिए तीन कबूतर भेंट में पाती हैं।’


अफीम तस्करों के इलाके में थानेदार बनकर जब कवि महोदय जाते हैं तो पता चलता है कि अगले थाना लिटरेचर फेस्टिवल की थीम है-जनक्रांति! प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि रचनाकार व्यासजी ने कवि को दर्पण बनाकर हौले से घुमाया है। कहीं ठहरकर चमकाया है। कोई कोना नहीं छोड़ा है, जहां दर्पण कुछ पल के लिए चमका न हो और चमकाया न हो। इस दर्पण में सारे हम्मामों की हलचल कवर है। हम्मामों में जलक्रीड़ा कर रहे हर नकली आदमी ने आंखें मिचमिचाई हैं। दूर छत पर खड़े व्यासजी दर्पण में सूरज को उतारकर उनके चेहरों पर रोशनी का शक्तिपात कर रहे हैं।


जो परमानंद किसी इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट को महीनों की मशक्कत के बाद लिखी किसी खोजपरक बमपलाटू खबर के छपने पर मिलता है या जंतर-मंतर पर अड़ियल आंदोलन के बाद सरकार के गिरने से आंदोलनजीवियों को प्राप्त होता है, बिल्कुल उतने ही कैरेट का परमानंद इन मनोहर कहानियों के लेखक ने दो सौ शब्दों के एक ही फ्रेम में लूट लिया है और बड़े मजे से वह अपने कवि को समेटकर दूसरे फ्रेम में चला गया है। अगले फ्रेम में फिर चकरी, अनार, फुलझड़ी और सुतली बम!


यशवंत व्यास ने तीन दशक से ज्यादा लंबी लेखन यात्रा में कलम से तरह-तरह की आतिशबाजी की है। उनके प्रयोग पैकेजिंग में ही नहीं होते। जब तक आप पैकेट को खोलकर बत्ती को नहीं सुलगाएंगे तब तक अंदाजा ही नहीं लगेगा कि चकरी कैसे अनार बन जाती है और फुलझड़ी से होकर कैसे व्याकरण को फाड़ने वाला सुतली बम फूटता है। उनकी लेखनी बहुत बारीक और सटीक मार करने वाली पैनी दृष्टि की उपज है, जिसमें शब्दों और वाक्यों के प्रयोग झरने से बहते हैं। ये ऐसे सात्विक व्यंग्य हैं, जो नग्न सत्य कथन करते हुए भी गरिमामय हैं। उनकी सर्वाधिक चर्चित पेशकश है-‘बोस्कियाना’, जो शायर-फिल्मकार गुलजार से उनकी यादगार संगत का पाठकों को मिला प्रसाद है।


‘कवि की मनोहर कहानियां’ कभी हरिशंकर परसाई तो कभी शरद जोशी और कभी श्रीलाल शुक्ल का अहसास एक आकर्षक उड़ान में कराती हैं, जैसे कालिदास के मेघ इन महान रचनाकारों के रचना संसार के ऊपर बह रहे हों! इन मेघों की सवारी के लिए अमेजन पर किताब को आज ही खटाक से ऑर्डर करना चाहिए!

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Courtesy : Shri Vijay Manohar Tiwari . विजय मनोहर तिवारी वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. इन दिनों राज्य सूचना आयुक्त हैं.

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