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शाम बेच दी है भाई, शाम बेच दी है Shivendra Pratap Singh recites Kedarnath Singh


शाम बेच दी है भाई, शाम बेच दी है Shivendra Pratap Singh recites Kedarnath Singh #khataakk Under KAVITA SABKI series Season -1 Episode -7.


#khataakk KAVITA SABKI FEST-21:Young minds recite Classic Poetry.

Filmmaker - #ShivendraPratapSingh recites #KedarnathSingh under the Series.

Every Friday , New Poet, New voice. Set your timer,share the joy.

ये ऐसी कविताएं हैं जो जितनी बार सुनो उतनी बार नई लगती हैं .

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शाम बेच दी है / केदारनाथ सिंह


शाम बेच दी है

भाई, शाम बेच दी है

मैंने शाम बेच दी है!


वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम,

वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,

मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,

वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम

वो दिनभर का पढ़ना, वो भूलों की शाम,

वो वन-वन के बांसों-बबूलों की शाम,

झिड़कियां पिता की, वो डांटों की शाम,

वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,

वो बांहों में नील आसमानों की शाम,

वो वक्ष तोड़ -तोड़ उठे गानों की शाम,

वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,

वो ढेरों दुआएं, वो लोरी की शाम,

वो बरगद पे बादल की पांतों की शाम

वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,

वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,

वो सपनों के घोड़े , वो टापों की शाम,


वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,

भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।


वो सड़कों की शाम, बयाबानों की शाम,

वो टूटे रहे जीवन के मानों की शाम,

वो गुम्बद की ओट हुई झेपों की शाम,

हाट-बाटों की शाम, थकी खेपों की शाम,

तपी सांसों की तेज रक्तवाहों की शाम,

वो दुराहों-तिराहों-चौराहों की शाम,

भूख प्यासों की शाम, रुंधे कंठों की शाम,

लाख झंझट की शाम, लाख टंटों की शाम,

याद आने की शाम, भूल जाने की शाम,

वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम,

वो चेहरे पर उड़ ते से भावों की शाम,

वो नस-नस में बढ़ते तनावों की शाम,

वो कैफे के टेबल, वो प्यालों की शाम,

वो जेबों पर सिकुड़न के तालों की शाम,

वो माथे पर सदियों के बोझों की शाम

वो भीड़ों में धड़ कन की खोजों की शाम,


वो तेज-तेज कदमों की शाम बेच दी है,

भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

- केदारनाथ सिंह (7 July 1934-19 March 2018)

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